कुछ लम्हे दिल के...

एक बार वक़्त से लम्हा गिरा कहीं, वहाँ दास्ताँ मिली लम्हा कहीं नहीं....गुलज़ार

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2020

वो सुबह

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सूरज ना पहले उठने पाए अधखुली आँखों से बोला करते थे टिक-टिक घड़ी की सुई के संग टक-टक दौड़ा करते थे ब्रेड गोलकर मुँह में ठूंस लेकर चाय क...
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मंगलवार, 7 अप्रैल 2020

मदारी और बंदर

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मदारी के हाथ में रस्सी है जो बंदर के गले में बंधी है मदारी डमरू बजाता है बंदर नाचता है ऐसे में बंदर के लिए कोई दूसरा विकल्प नहीं मदारी ...
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शुक्रवार, 27 मार्च 2020

सवालों के घेरे

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1. सवाल पूछते ही 'यह समय सवाल करने का नहीं!' 'यह समय मानवता के लिए है!' 'यह समय एक-दूसरे के लिए है!' 'यह स...
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मंगलवार, 24 मार्च 2020

क्यों न ऐसा कुछ किया जाए

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दोस्तों, क्यों न ऐसा कुछ किया जाए अब, जब नगर, गली, मोहल्ला चाक-चौबंद हो खड़ा है हर कोई अपने लिए चिंतित पड़ा है आपदा तो है, फिर भी सुर...
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गुरुवार, 30 जनवरी 2020

अच्छे दिन!

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अब न विचार में गांधी हैं न हृदय में राम ही 'गांधी' की जगह 'गोली मारो' हो गया और 'राम' की जगह 'राज करो'।...
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गुरुवार, 9 जनवरी 2020

मृत्यु का प्रमाण

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मैं, पत्थर हूँ, पड़ा रहता हूँ कहीं भी चल-फिर नहीं सकता न कुछ बोल सकता हूँ न ही देख-सुन सकने की क्षमता है मेरी काई सी जम जाती है मेरे श...
गुरुवार, 14 नवंबर 2019

समय का संताप

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समय कहाँ पर आ कर ठहरा है? अंधेरे का वर्चस्व गहरा है क्या सरपंच, क्या पंचायत की कहें पूरा गाँव ही जब अंधा, गूँगा, बहरा है लगा ज्ञानमंदि...
सोमवार, 11 नवंबर 2019

ये देसी खिलौने

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आज भी मिलते हैं ये झुनझुने और भोंपू लेकिन आजकल के बच्चे इससे नहीं खेलते फिर भी क्यों बनते हैं ऐसे खिलौने? कौन खरीदता होगा इन्हें? आपका ...
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रविवार, 6 अक्टूबर 2019

किसका दुःख है जायज़?

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कहते हैं एक-दूसरे से दो देशों के रहवासी यह, बताओ किसका दुःख है बड़ा, किसकी परेशानी है जायज़...? वे कहते हैं, "हमें मेट्रो चाहिए, हम ...
बुधवार, 2 अक्टूबर 2019

दशहार

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देश पहले हो किन्तु देशवासी? सड़क-सड़क स्वच्छ हो किन्तु विचार? नगर-नगर विकसित हो किन्तु जंगल? मंच-मंच भाषण हो किन्तु सवाल? घोष ज...
शनिवार, 14 सितंबर 2019

भय

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स्थापित हो जाना एक ऐसी शय है जिसे भय होता है हर पल गिराए जाने का रोपित किए जाते समय भयभीत नहीं करता भूमि का कच्चापन न ही उखड़ जाने का ह...
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गुरुवार, 22 अगस्त 2019

उसकी याद

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अब भी याद आती है वह। जब रोते-रोते हिचकी बंध जाती वह पास आकर पुचकारती कभी बाँहों में भरकर ढाढस बँधाती, सहलाती। अब भी याद आती है वह। ...
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गुरुवार, 15 अगस्त 2019

तुम देशद्रोही हो!

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क्या? तुम प्रश्न करते हो? तुम देशद्रोही हो! तुम नमन नहीं सलाम करते हो? तुम देशद्रोही हो! तुम सूरज की जगह चाँद देखते हो? तुम देशद्रो...
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शनिवार, 3 अगस्त 2019

मायने

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लिखें तो क्या लिखें हँसी लिखें, खुशी लिखें या कि लिखें दर्द? या वो लिखें जो आता है नज़र? लेकिन, जो नज़र आता है उसे लिखा जाता है क्या? ...
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मंगलवार, 11 जून 2019

जनतंत्र

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एक आदमी अपने अंतर की सुनता है एक आदमी भीड़ की सुनता है भीड़ की सुनने में, उसके जैसा करने में भय नहीं रहता भय नहीं रहता क्योंकि कोई जिम्म...
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रविवार, 9 दिसंबर 2018

क्या दीवार हो तुम?

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कुछ देखो-सुनो, तो बोलो कि तुम नहीं हो कोई दीवार जो जकड़ी होती है सीमेंट से, बालू से ताकि ढह ना जाए। या तुम भी जकड़े हुए हो ऐसे ही सी...
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रविवार, 4 नवंबर 2018

मैं, सोच रहा हूँ

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मैं, नर्मदा पर खड़ा सोच रहा हूँ अब लोग मेरे जिस्म को छू सकेंगे लेकिन क्या इन फौलादी ऊँचाईयों पर उनके एहसास भी मुझको छू सकेंगे? मैं सो...
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मंगलवार, 19 जून 2018

भीड़

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भीड़ भीड़ की न कोई चेतना होती है न ही कोई विचार भीड़ बस भीड़ होती है भीड़ एक ही समय में दो जगह होती है भीड़ पक्ष में होती है भीड़ विपक्...
6 टिप्‍पणियां:
शनिवार, 1 जुलाई 2017

कुछ अनपढ़े पन्ने

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किताबों के कुछ पन्ने बार-बार खुल जाते हैं  कुछ वो जो मन से पढ़े गए हों या फिर  वो जिन पर मोड़ पड़ गए हों कुछ के बीच बुकमार्क लगे मिल जाते ह...
18 टिप्‍पणियां:
शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017

प्रेम...

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  मधुमास यानी प्रेम का मास... प्रेम शब्दों में सिमटी कोई कविता नहीं है जिसे प्रकट करने के लिए कहा जाय प्रेम प्रकट किये जाने का मोहताज भ...
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अर्चना तिवारी
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