रविवार, 4 नवंबर 2018

मैं, सोच रहा हूँ

मैं, नर्मदा पर खड़ा सोच रहा हूँ
अब लोग मेरे जिस्म को छू सकेंगे
लेकिन क्या इन फौलादी ऊँचाईयों पर
उनके एहसास भी मुझको छू सकेंगे?
मैं सोच रहा हूँ
रियासतों का एकीकरण किया था लेकिन
क्या सियासतों का एकीकरण कर सकूँगा?
प्रतीक बना हूँ एकता का
क्या नफरतों को खंडित कर सकूँगा?
मैं, नर्मदा पर खड़ा सोच रहा हूँ
लौहपुरुष था, पर लोहे का नहीं था मैं।

मंगलवार, 19 जून 2018

भीड़

भीड़
भीड़ की न कोई चेतना होती है
न ही कोई विचार
भीड़ बस भीड़ होती है
भीड़ एक ही समय में दो जगह होती है
भीड़ पक्ष में होती है
भीड़ विपक्ष में होती है
भीड़ किसी की नहीं होती
भीड़ बस भीड़ होती है
भीड़ एक पल में प्रतिष्ठित करती है
भीड़ एक पल में धूल-धूसरित करती है
भीड़ बस भीड़ होती है
भीड़ सुनती नहीं
भीड़ देखती नहीं
भीड़ कुछ कहती नहीं
भीड़ चाटुकार है
भीड़ अहंकार है
भीड़ दबाव है
भीड़ फरमान है
भीड़ सम्मान नहीं
भीड़ स्वाभिमान नहीं
भीड़ दोस्त नहीं
भीड़ जिंदा इंसान नहीं
भीड़ कोई पुरस्कार नहीं
भीड़ का कोई सरोकार नहीं
भीड़ बस भीड़ होती है

शनिवार, 1 जुलाई 2017

कुछ अनपढ़े पन्ने

किताबों के कुछ पन्ने बार-बार खुल जाते हैं
 कुछ वो जो मन से पढ़े गए हों
या फिर  वो जिन पर मोड़ पड़ गए हों
कुछ के बीच बुकमार्क लगे मिल जाते हैं
जो लगाए गए होते हैं याद रखने  के लिए
आगे पढ़े जाने के लिए
लेकिन  उन्हें  कभी पढ़ने का मौका नहीं मिलता
ऐसे ही किसी दिन दिख जाते हैं
पन्नों के बीच फँसे हुए, बिना अर्थ के....

साफ-सफाई करते हुए हाथ लग जाती हैं कुछ किताबें
किताबें जो कभी पढ़ी नहीं जातीं
बस संभालकर रख दी जातीं हैं
कि शायद कभी कुछ पढ़ना पड़ जाए
भले ही उसके पृष्ठ कट-पिट जाएँ
मलीन होते जाएँ
और धीरे-धीरे गुम होते जाएँ
फिर भी नहीं छोड़ा जाता उनका मोह

लेकिन कभी यूँ ही बैठे ठाले
साफ-सफाई करते हुए
अनचित्ते अनमने से
उनके पृष्ठों की कुछ पंक्तियों पर निगाह चली जाती है
और वो पंक्तियाँ मन से बातें करने लग जाती हैं
फिर...
फिर सहसा यूँ ही अधूरी अनपढ़ी छोड़ दी जाती हैं
दोबारा बड़े जतन से रख दी जाती हैं
अंधेरी अलमारियों में किसी कोने

ऐसी किताबें हों या ऐसे कुछ रिश्ते
जीवन भर संजोकर तो रखे जाते हैं
पर यूँ ही उनपर निगाहें नहीं जातीं
यूँ ही उनसे दो बातें नहीं की जातीं...

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017

प्रेम...

 मधुमास यानी प्रेम का मास...
प्रेम शब्दों में सिमटी कोई कविता नहीं है
जिसे प्रकट करने के लिए कहा जाय
प्रेम प्रकट किये जाने का मोहताज भी नहीं है
क्योंकि यह अप्रकट होकर भी संचारित हो जाता...
प्रेम शर्तों में लिपटी कोई नियमावली भी नहीं है
जिसको मानने के लिए  बाध्य किया जाय
क्योंकि प्रेम बाँधे जाने पर नहीं जुड़ता
यह जुड़ता है अबाध विश्वास से ....


रविवार, 4 दिसंबर 2016

भोर का चाँद

भोर का चाँद 
अधिक देर तक नहीं दिखता 
फिर भी उग आता है भोर में

शायद वह जानता है 
कि इस पर उसका वश नहीं है
वश है तो केवल चलते रहने पर

वह जानता है
कि दिन में उसका अस्तित्व बेशक ना हो
पर रात पर तो उसी का एकाधिकार है...




बुधवार, 30 नवंबर 2016

तुम हो...

तुम सिर्फ़ अपने नाम तक सीमित नहीं हो
तुम सिर्फ़ अपने सम्मान तक सीमित नहीं हो
तुम सिर्फ़ अपने गान तक भी सीमित नहीं हो
तुम बिखरे पड़े हो
नदी, पहाड़, जंगल, खाड़ी, सागर, मैदान, रेगिस्तान में 
तुम समाए हुए हो
हर दिल, हर धड़कन, हर नब्ज़ में
तुम समाए हुए हो हर आवाज़ में, हर इंकलाब में
तुम शब्द नहीं
जिसे सिर्फ़ तेरह पंक्तियों में समेटा जाय
तुम पल नहीं
जिसे सिर्फ़ बावन सेकेण्ड तक महसूसा जाय
तुम रंग नहीं
जिसे सिर्फ़ तीन रंगों में रंगा जाय
और तुम कोई आदेश भी नहीं
जिसे थोपा जाय
तुम असीमित हो, तुम अपरिभाषित हो
तुम अकथनीय हो, तुम बेरंग हो
तुम देश हो
कोई सामान नहीं हो...
-अर्चना

रविवार, 25 सितंबर 2016

कचरे की वस्तुएँ

इंसान बड़ा सयाना है
वह सब जानता है
कि उसे क्या चाहिए, क्या नहीं
नहीं रखता कभी
अपने पास, अपने आसपास 
ग़ैरज़रूरी, व्यर्थ की वस्तुएँ
उन्हें फेंक देता है उठाकर
कचरे के डिब्बे में प्रतिदिन।
इंसान बड़ा सयाना है
नहीं फेंकता कुछ वस्तुएँ कभी
किसी भी कचरे के डिब्बे में
बेशक वे कितनी ही सड़-गल जाएँ
कितनी ही दुर्गन्धयुक्त हो जाएँ
उन्हें रखता जाता है सहेजकर
मन के डिब्बे में प्रतिदिन।