शनिवार, 1 जुलाई 2017

कुछ अनपढ़े पन्ने

किताबों के कुछ पन्ने बार-बार खुल जाते हैं
 कुछ वो जो मन से पढ़े गए हों
या फिर  वो जिन पर मोड़ पड़ गए हों
कुछ के बीच बुकमार्क लगे मिल जाते हैं
जो लगाए गए होते हैं याद रखने  के लिए
आगे पढ़े जाने के लिए
लेकिन  उन्हें  कभी पढ़ने का मौका नहीं मिलता
ऐसे ही किसी दिन दिख जाते हैं
पन्नों के बीच फँसे हुए, बिना अर्थ के....

साफ-सफाई करते हुए हाथ लग जाती हैं कुछ किताबें
किताबें जो कभी पढ़ी नहीं जातीं
बस संभालकर रख दी जातीं हैं
कि शायद कभी कुछ पढ़ना पड़ जाए
भले ही उसके पृष्ठ कट-पिट जाएँ
मलीन होते जाएँ
और धीरे-धीरे गुम होते जाएँ
फिर भी नहीं छोड़ा जाता उनका मोह

लेकिन कभी यूँ ही बैठे ठाले
साफ-सफाई करते हुए
अनचित्ते अनमने से
उनके पृष्ठों की कुछ पंक्तियों पर निगाह चली जाती है
और वो पंक्तियाँ मन से बातें करने लग जाती हैं
फिर...
फिर सहसा यूँ ही अधूरी अनपढ़ी छोड़ दी जाती हैं
दोबारा बड़े जतन से रख दी जाती हैं
अंधेरी अलमारियों में किसी कोने

ऐसी किताबें हों या ऐसे कुछ रिश्ते
जीवन भर संजोकर तो रखे जाते हैं
पर यूँ ही उनपर निगाहें नहीं जातीं
यूँ ही उनसे दो बातें नहीं की जातीं...

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017

प्रेम...

 मधुमास यानी प्रेम का मास...
प्रेम शब्दों में सिमटी कोई कविता नहीं है
जिसे प्रकट करने के लिए कहा जाय
प्रेम प्रकट किये जाने का मोहताज भी नहीं है
क्योंकि यह अप्रकट होकर भी संचारित हो जाता...
प्रेम शर्तों में लिपटी कोई नियमावली भी नहीं है
जिसको मानने के लिए  बाध्य किया जाय
क्योंकि प्रेम बाँधे जाने पर नहीं जुड़ता
यह जुड़ता है अबाध विश्वास से ....


रविवार, 4 दिसंबर 2016

भोर का चाँद

भोर का चाँद 
अधिक देर तक नहीं दिखता 
फिर भी उग आता है भोर में

शायद वह जानता है 
कि इस पर उसका वश नहीं है
वश है तो केवल चलते रहने पर

वह जानता है
कि दिन में उसका अस्तित्व बेशक ना हो
पर रात पर तो उसी का एकाधिकार है...




बुधवार, 30 नवंबर 2016

तुम हो...

तुम सिर्फ़ अपने नाम तक सीमित नहीं हो
तुम सिर्फ़ अपने सम्मान तक सीमित नहीं हो
तुम सिर्फ़ अपने गान तक भी सीमित नहीं हो
तुम बिखरे पड़े हो
नदी, पहाड़, जंगल, खाड़ी, सागर, मैदान, रेगिस्तान में 
तुम समाए हुए हो
हर दिल, हर धड़कन, हर नब्ज़ में
तुम समाए हुए हो हर आवाज़ में, हर इंकलाब में
तुम शब्द नहीं
जिसे सिर्फ़ तेरह पंक्तियों में समेटा जाय
तुम पल नहीं
जिसे सिर्फ़ बावन सेकेण्ड तक महसूसा जाय
तुम रंग नहीं
जिसे सिर्फ़ तीन रंगों में रंगा जाय
और तुम कोई आदेश भी नहीं
जिसे थोपा जाय
तुम असीमित हो, तुम अपरिभाषित हो
तुम अकथनीय हो, तुम बेरंग हो
तुम देश हो
कोई सामान नहीं हो...
-अर्चना

रविवार, 25 सितंबर 2016

कचरे की वस्तुएँ

इंसान बड़ा सयाना है
वह सब जानता है
कि उसे क्या चाहिए, क्या नहीं
नहीं रखता कभी
अपने पास, अपने आसपास 
ग़ैरज़रूरी, व्यर्थ की वस्तुएँ
उन्हें फेंक देता है उठाकर
कचरे के डिब्बे में प्रतिदिन।
इंसान बड़ा सयाना है
नहीं फेंकता कुछ वस्तुएँ कभी
किसी भी कचरे के डिब्बे में
बेशक वे कितनी ही सड़-गल जाएँ
कितनी ही दुर्गन्धयुक्त हो जाएँ
उन्हें रखता जाता है सहेजकर
मन के डिब्बे में प्रतिदिन।


शुक्रवार, 16 सितंबर 2016

जिंदगी हर सुबह की

ज़िन्दगी शुरू होती है हर सुबह
कुछ इस तरह
रोज़मर्रा के काम जल्दी-जल्दी निपटाना
तैयार हो काम के लिए निकलना
ठीक स्कूटर निकालते वक़्त
एक स्कूल की वैन का घर के सामने रुकना
ड्राइवर का मुझे निकलते हुए देखना
बच्चों का खिड़की से झाँकना
फिर एक अंजाना सा रिश्ता बन जाना
और प्रतिदिन की आदत में शुमार हो जाना
ज़िन्दगी शुरू होती है हर सुबह
कुछ इस तरह।


घर से निकलते ही
कुछ दूरी पर छड़ी लिए एक बुज़ुर्ग का मिलना
चौराहे पर बस के इंतज़ार में खड़े
रोज़ाना उन्हीं चेहरों का दिखना
बगल से सर्राटा स्कूल बसों का निकलना
फिर एक अंजाना सा रिश्ता बन जाना
और प्रतिदिन की आदत में शुमार हो जाना
ज़िन्दगी शुरू होती है हर सुबह
कुछ इस तरह।


वही शहीद पथ, वही फ़्लाईओवर
वही बाईं ओर उगते सूरज का दिखना
वही रेलिंग, वही पंछियों के जोड़ों का बैठना
फिर एक अंजाना सा रिश्ता बन जाना
और प्रतिदिन की आदत में शुमार हो जाना
ज़िन्दगी शुरू होती है हर सुबह
कुछ इस तरह।


कोने वाली वही अंडे-दूध-ब्रेड की गुमटी
साईकिल पर जाते वही स्कूली बच्चे
झोपड़ी के बाहर सड़क के किनारे बैठे
कटोरे में चाय पीते फैन खाते बच्चे
पास ही कुत्तों के झुण्ड को
कूदते फाँदते देखना फिर अचानक
उनका स्कूटर के आगे आ जाना
फिर एक अंजाना सा रिश्ता बन जाना
और प्रतिदिन की आदत में शुमार हो जाना
ज़िन्दगी शुरू होती है हर सुबह
कुछ इस तरह।


वही उबड़-खाबड़ खड़न्जों का रास्ता
पानी के गड्ढों को पार कर
स्कूल पहुंचना
गुडमॉर्निंग की आवाज़ों का स्वागत करना
भागते हुए अंदर जाना
निगाह दीवार घड़ी की सात दस की सुइयों से टकराना
रजिस्टर पर पड़े वही बिना ढक्कन के पेन का होना
साइन करना और एक साँस में सीढियाँ चढ़ जाना
और स्टाफरूम में जाकर बैठ जाना
एक घूँट पानी गले से उतारना
और साँसों में स्फूर्ति का भर जाना
फिर एक अंजाना सा रिश्ता बन जाना
और प्रतिदिन की आदत में शुमार हो जाना
ज़िन्दगी शुरू होती है हर सुबह
कुछ इस तरह।


सोचती हूँ इन्हें शब्दों के डिब्बों में बंद कर लूँ
ताकि जब कभी जीवन अकेला सा लगे
हाथों से छूटता सा लगे
तो खोल कर बाहर निकाल लूँ इन खुशनुमा पलों को
फिर से अपने अंदर स्फूर्ति भरने के लिए
जीवन के बचे हुए सफ़र को तय करने के लिए
ताकि ये रहें हमेशा मेरे साथ, मेरे बाद।




रविवार, 14 अगस्त 2016

तुम्हें पता है ?...

तुम चाहे कितना ही चुप  रहो 
तुम्हारी आँखों के नुकीले कोर 
सदा मुस्कुराते हैं....