रविवार, 14 अगस्त 2016

तुम्हें पता है ?...

तुम चाहे कितना ही गंभीर रहो 
तुम्हारी आँखों के नुकीले कोर 
सदा मुस्कुराते हैं....

रविवार, 5 जून 2016

मील के पत्थर


दूरियाँ बताते
तसल्ली दिलाते
रास्तों में गड़े मिल जाते हैं
अनगिनत मील के पत्थर।


दिशाएँ दिखाते, आस जगाते
रास्ते पर तने मिल जाते हैं
असंख्य बोर्ड।


लेकिन कुछ दूरियाँ

ऐसी होती हैं
जिनके लिए

न कोई मील के पत्थर मिलेंगे
न ही कोई दिशा दिखाने वाले बोर्ड

उनको स्वयं तय करना पड़ता है
भटकना पड़ता है

खोजना पड़ता है
अपने विवेक, हौसले और विश्वास से।




मंगलवार, 31 मई 2016

शब्द चुभते हैं

चुभते हैं।
कुछ शब्द
चुभते हैं।


रिश्तों के बीच हो जाती हैं
जब छुटपुट झड़पें
अनजाने ही बन जाते हैं
कुछ शब्द
किरकिरे नुकीले बाण
जो चल जाते हैं
अपनों पर
और फिर
जीवन पर्यंत
चुभते रहते हैं।


कुछ शब्द 

चुभते रहते हैं।


शब्द रच देते हैं
एक अभेद चक्रव्यूह
जिसमें फँसता जाता है
जितना भी निकलना चाहता है
जो न जीता है न मरता
अकेला निहत्था
रिश्ता।

गुरुवार, 26 मई 2016

पानी मर गया....



पथराई आस

पथराई आँख

शायद पानी मर गया.....




                                             (माइक्रो सॉफ्ट पेण्ट पर बना स्व-रचना चित्र)

बुधवार, 25 मई 2016

रिश्ता...

जो करीब है
वो दूर बहुत है, 
जो दूर बहुत है
वही करीब है...









रविवार, 10 नवंबर 2013

चल पड़े हैं राह पर मंज़िल तो आ ही जायेगी

धूप है तो क्या घटा इक रोज़ छा ही जायेगी 
चल पड़े हैं राह पर मंज़िल तो आ ही जायेगी 

आज पतझर, फूल, पत्ती, डालियों को रौंद ले 
जब बहार आएगी गुलशन को सजा ही जायेगी 

इस हवस पर आप खुश हैं एक दिन होगा यही
आपकी औकात पलभर में घटा ही जायेगी

जाति, भाषा, धर्म, बोली की सियासत आग है
इस नगर से उस नगर तक बस तबाही जायेगी

आ के टकराता है अक्सर एक अदना सा ख़याल
क्या अदालत में कभी सच्ची गवाही जायेगी ?

इसकी उलझन छोड़िये, इसके लिए मत सोचिये
बुज़दिली कमज़ोर शय है मुँह की खा ही जायेगी

क्रांति हो, ललकार हो या ज़ोर की ओंकार हो
अर्चना होने से कैसे राजशाही जायेगी

रविवार, 9 अक्तूबर 2011

ऐसा भी !!!




नकली बाम / ऊँचे दाम
त्रस्त अवाम / मूक निजाम
भ्रष्टाचार / होता आम
शहरी रोड / ट्रेफिक जाम
कुर्सी आज/ चारों धाम
ख़ूनी हाँथ / मुख में राम
उजड़े खेत/ हल नीलाम
कन्या दान/ मुश्किल काम
राहत  कोष/ माघी घाम
बनते माल/ मिटते ग्राम
अफ़सर राज/ फ़ाइल झाम
आँगन धूप/ ढलती शाम
झूठी शान / नकली नाम
अब  श्रमदान/ पैसा  थाम
रावण  राज /कब आराम
अपना  देश / फिर से गुलाम ?

(चित्र गूगल सर्च से साभार )