रविवार, 13 जून 2021

चलती का नाम ऑनलाइन ज़िंदगी :

 और दुनिया पीडीएफ में 

बच्चों की पुस्तक पीडीएफ में 

बच्चों को काम देना पीडीएफ में

बच्चों से काम लेना पीडीएफ में

टाइम टेबल पीडीएफ में

पाठ्यक्रम पीडीएफ में 

नाम की सूची पीडीएफ में

अंक सूची पीडीएफ में

सूचना पीडीएफ में 


देखने चलो तो मेमोरी फुल 

मोबाइल का डब्बा गुल 


सिर्फ यही नहीं


अखबार पढ़ो पीडीएफ में

पत्रिका पढ़ो पीडीएफ में 

उपन्यास पढ़ो पीडीएफ में 

पुस्तकें पढ़ो पीडीएफ में 


पढ़ने चलो तो मेमोरी फुल 

मोबाइल का डब्बा गुल 


और तो और


डाॅक्टर का पर्चा पीडीएफ में

मेडिकल रिपोर्ट पीडीएफ में 

दवाओं की सूची पीडीएफ में 

सारे बिल पीडीएफ में

ये लो

शादी का निमंत्रण पत्र भी पीडीएफ में 


अब तो ऐसा लगता है 

जैसे ज़िंदगी बंद है पीडीएफ में 

जीने चलो तो मेमोरी फुल

दिमाग का डब्बा गुल 


काश! ऐसा कुछ हो जाए

ये दुख, ये दर्द, 

ये भूख, ये बीमारी,

ये बेरोजगारी, ये लाचारी

ये भ्रष्टाचारी, ये सपने सरकारी 

 सब के सब आ जाएँ किसी पीडीएफ में 

और किसी मोबाइल की मेमोरी से हो जाएँ 

हमेशा के लिए गुल!!


- अर्चना तिवारी

शनिवार, 16 मई 2020

अपेक्षित

भरा-पूरा परिवार था, है भी
बड़े थे, छोटे हैं और हम भी
अब कोई कहाँ तो कोई कहाँ
कोई किस गाल में तो कोई किस गाल में
समाते गए
कुछ बचे हैं अभी, उनकी भी गति यही होनी है
समाना है एक न एक दिन उनको भी किसी न किसी गाल में।

बस करना यह है कि
जितने दिन भी जुड़े रहें अपनी-अपनी डालियों से
उल्लासित रहें और लुभाते रहें सबको
अपने हरे-भरे से
ताकि जिस गाल जाएँ
उसमें भी भर दें अपनी खट्टी-मीठी याद।

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2020

वो सुबह

सूरज ना पहले उठने पाए
अधखुली आँखों से बोला करते थे
टिक-टिक घड़ी की सुई के संग
टक-टक दौड़ा करते थे
ब्रेड गोलकर मुँह में ठूंस
लेकर चाय का एक बड़ा-सा घूंट
स्कूल को भागे जाते थे

दौड़ती-भागती सड़कों वाली
वो सुबह फिर कब आयेगी?

थोड़े खीझे थोड़े मगन
बच्चों के संग रहते थे
रविवार की ख्वाहिश में हम
हफ़्ता पूरा करते थे
थोड़ी गप्पें साथियों के संग
मौका मिलते ही करते थे
शोर-शराबे में थोड़ा सा
सुकून का पल ढूंढा करते थे

हँसी-ठिठोली मुखड़ों वाली
वो सुबह फिर कब आयेगी?

अब तो चहुँ ओर बस बंद-बंद
सूरज बंद, चंदा बंद
निखरना बंद, संवरना बंद
चहचहाना बंद, चिल्लाना बंद
दिन रात के इस बंद-बंद में
हो गया हो जैसे जीवन ही बंद
अब सोते-जागते हरदिन
इस आस में खोए रहते हैं

खुली-खुली सरहदों वाली
वो सुबह फिर कब आयेगी?



मंगलवार, 7 अप्रैल 2020

मदारी और बंदर

मदारी के हाथ में रस्सी है जो बंदर के गले में बंधी है
मदारी डमरू बजाता है
बंदर नाचता है
ऐसे में बंदर के लिए कोई दूसरा विकल्प नहीं
मदारी डमरू बजाता रहेगा
बंदर नाचता रहेगा
तब तक, जब तक बंदर मर ना जाए
या मदारी का डमरू फट ना जाए।



शुक्रवार, 27 मार्च 2020

सवालों के घेरे

1.
सवाल पूछते ही
'यह समय सवाल करने का नहीं!'
'यह समय मानवता के लिए है!'
'यह समय एक-दूसरे के लिए है!'
'यह समय एक होने के लिए है!'
सवाल के बदले आ पड़ते हैं
छरछराते हुए पानी के अनगिनत फव्वारेनुमा शब्द
ठंडा करने
जलते हुए उस सवाल को
सवाल भीगता है
किन्तु ठंडा कहाँ होता है?

2.
सवाल की प्रकृति होती है
जलते अंगारों सी
पानी डालने पर बुझता अवश्य है
किन्तु धुँआ छोड़ जाता है
दम घोंटने वाला
फिर दोबारा निकलता है
किसी फेफड़े से
सवाल बनकर।

3.
उत्तर की आस में धमकाए जाने पर
सवाल बेचारा
चला जाता है मस्तिष्क के किसी कोने में दुबकने के लिए
किसी नस के बहुत अंदर तक
घुमड़ता है किन्तु नहीं दुबक पाता
क्योंकि नहीं पहुँचा जा सकता दोबारा वहाँ
जहाँ से किसी का जन्म होता है
बाहर पनपना ही
जीवित रखता है मानव हो,  मानवता हो या कि उसके पर्याय सवाल।

4.
सवाल परिंदा है
नहीं रह सकता वह अपने घोंसले में चुपचाप
वह तो फुदकेगा डाली-डाली
पिंजरे में और भी चीखता है
अंततः मर जाता है
किन्तु
दे जाता है चेतावनी
पूरी कायनात को
कि आज़ादी ही जिंदगी है
चाहे परिंदे की हो या सवाल की।

5.
अब, सब कैद में हैं
तो कम से कम इतनी फुर्सत तो है ही
कि याद कर लें उन सब सवालों को
जिनके जन्म लेते ही
मरोड़ दी थी गर्दन
गर उन्हें जिंदा रहने दिया होता
तो हो सकता है कि
यह कैद उम्रकैद में तब्दील होने से बच सकती थी।

6.
सवाल कभी बुरा नहीं होता
सवाल कभी बेवक्त नहीं होता
सवाल का कोई वक्त नहीं होता
सवाल कभी बेवजह नहीं होता
किंतु अब कोई सवाल नहीं करेगा यह भी सच है
क्योंकि अब उत्तर देने की आपकी बारी है।

                                - अर्चना तिवारी

मंगलवार, 24 मार्च 2020

क्यों न ऐसा कुछ किया जाए

दोस्तों,
क्यों न ऐसा कुछ किया जाए

अब, जब नगर, गली, मोहल्ला चाक-चौबंद हो खड़ा है
हर कोई अपने लिए चिंतित पड़ा है
आपदा तो है, फिर भी
सुरक्षित हो लिया है हर वो आदमी
जिसके सिर पर थी छत पक्की घनी

कुछ जो आए थे किसी गाँव से, कस्बे से या किसी सुदूर स्थान से
रहते थे ठेला खड़ा किए हुए
किसी डिवाइडर पर तने खंभे से सटे हुए
ऐसे में उनका रोजगार थम गया है
इसलिए ईंटों वाला उनका चूल्हा भी बिखरा पड़ा है।

तो क्यों न ऐसा कुछ किया जाए
कि बिना गिलास भर उनसे संतरे का रस खरीदे हुए,
कि बिना दोने भर चटपटी चाट खाए हुए,
बिना रिक्शे पर बैठे हुए,
दाम चुकता कर दिया जाए
क्यों न इस बार
एक सौदा ऐसा किया जाए।

(चित्र वाया गूगल, yourquote.in )
(चित्र हइकू - नेह सुनीता)

गुरुवार, 30 जनवरी 2020

अच्छे दिन!

अब
न विचार में गांधी हैं
न हृदय में राम ही
'गांधी' की जगह 'गोली मारो' हो गया
और 'राम' की जगह 'राज करो'।

अब
न देश सोने की चिड़िया है
न अनेकता में एकता ही
'सोने की चिड़िया' 'ट्विटर' हो गई
और 'एकता' 'धारावाहिक निर्माता'।

अब
न बाग में माली है
न पौधे को पानी ही
'माली' 'महंत' हो गया
और 'पानी' 'करंट'।

तो बोलो जय हो संत!