मंगलवार, 24 मार्च 2020

क्यों न ऐसा कुछ किया जाए

दोस्तों,
क्यों न ऐसा कुछ किया जाए

अब, जब नगर, गली, मोहल्ला चाक-चौबंद हो खड़ा है
हर कोई अपने लिए चिंतित पड़ा है
आपदा तो है, फिर भी
सुरक्षित हो लिया है हर वो आदमी
जिसके सिर पर थी छत पक्की घनी

कुछ जो आए थे किसी गाँव से, कस्बे से या किसी सुदूर स्थान से
रहते थे ठेला खड़ा किए हुए
किसी डिवाइडर पर तने खंभे से सटे हुए
ऐसे में उनका रोजगार थम गया है
इसलिए ईंटों वाला उनका चूल्हा भी बिखरा पड़ा है।

तो क्यों न ऐसा कुछ किया जाए
कि बिना गिलास भर उनसे संतरे का रस खरीदे हुए,
कि बिना दोने भर चटपटी चाट खाए हुए,
बिना रिक्शे पर बैठे हुए,
दाम चुकता कर दिया जाए
क्यों न इस बार
एक सौदा ऐसा किया जाए।

(चित्र वाया गूगल, yourquote.in )
(चित्र हइकू - नेह सुनीता)

9 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज बुधवार 25 मार्च 2020 को साझा की गई है...... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. " तो क्यों न ऐसा कुछ किया जाए
    कि बिना गिलास भर उनसे संतरे का रस खरीदे हुए,
    कि बिना दोने भर चटपटी चाट खाए हुए,
    बिना रिक्शे पर बैठे हुए,
    दाम चुकता कर दिया जाए
    क्यों न इस बार
    एक सौदा ऐसा किया जाए।"

    उत्तम👌

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  3. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शुक्रवार (27-03-2020) को नियमों को निभाओगे कब ( चर्चाअंक - 3653) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    *****
    आँचल पाण्डेय

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  4. बहुत ही बेहतरीन विचार हैं।
    बहुत अच्छी रचना

    तो क्यों न ऐसा कुछ किया जाए
    कि बिना गिलास भर उनसे संतरे का रस खरीदे हुए,
    कि बिना दोने भर चटपटी चाट खाए हुए,
    बिना रिक्शे पर बैठे हुए,
    दाम चुकता कर दिया जाए


    आभार

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  5. बहुत सुंदर सोच ,आज मानवता के लिए बेहद जरुरी ,सादर नमन

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  6. मानवीय जंगलों के बीच सुंंदर झरना है ये रचना... सुनीता जी

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  7. बहुत नेक ख़याल है ।
    ऐसे कठिन समय में ऐसी कविताएं मन ढूंढता रहता है । शुक्रिया ।

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