सोमवार, 15 फ़रवरी 2010

दुश्मन




मिलते हैं यहाँ दुश्मन, हमसाज़ नहीं मिलते
जो दोस्त हैं उनके भी अंदाज़ नहीं मिलते

ये ज़ुल्मो-सितम कैसे मिट पाएँगे दुनिया से
बुजदिल हैं सभी चेहरे जांबाज़ नहीं मिलते

जख्मी है बदन अपना ये रूह भी जख्मी है
हाल अपना बताने को अल्फाज़ नहीं मिलते

कोई भी किसी से अब कुछ भी नहीं कहता है
इंसानों की बस्ती में हमराज़ नहीं मिलते

उलझन से, मुसीबत से, अब हुस्न के जलवों में
नखरे नहीं मिलते हैं, वो नाज़ नहीं मिलते.



(चित्र गूगल सर्च से साभार)

26 टिप्‍पणियां:

  1. जख्मी है बदन अपना ये रूह भी जख्मी है
    हाल अपना बताने को अल्फाज़ नहीं मिलते

    इन पंक्तियों ने दिल छू लिया... बहुत सुंदर ....रचना....

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  2. कम शब्दों में बहुत सुन्दर कविता।
    बहुत सुन्दर रचना । आभार

    ढेर सारी शुभकामनायें.

    SANJAY KUMAR
    HARYANA
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  3. ये ज़ुल्मो-सितम कैसे मिट पाएँगे दुनिया से
    बुजदिल हैं सभी चेहरे जांबाज़ नहीं मिलते

    जख्मी है बदन अपना ये रूह भी जख्मी है
    हाल अपना बताने को अल्फाज़ नहीं मिलते..

    सभी शेर बहुत खूबसूरत बन पड़े है इस ग़ज़ल के ..... बहुत बहुत बधाई .........

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  4. बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति ।

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  5. एक से बढ़कर एक शेर पढ़कर मन कह रहा है कि...
    बहुत अच्छी ग़ज़ल कही है आपने

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  6. ये ज़ुल्मो-सितम कैसे मिट पाएँगे दुनिया से
    बुजदिल हैं सभी चेहरे जांबाज़ नहीं मिलते


    waah bahut shaandaar sher
    kamal likhti hai aap

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  7. अर्चना जी, आदाब
    ग़ज़ल के सभी शेर एक से बढ़कर एक हैं
    ये शेर तो खास बन गया-
    जख्मी है बदन अपना ये रूह भी जख्मी है
    हाल अपना बताने को अल्फाज़ नहीं मिलते
    वाह वाह

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  8. मिलते हैं यहाँ दुश्मन, हमसाज़ नहीं मिलते
    जो दोस्त हैं उनके भी अंदाज़ नहीं मिलते
    .......waah

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  9. "उलझन से, मुसीबत से, अब हुस्न के जलवों में
    नखरे नहीं मिलते हैं, वो नाज़ नहीं मिलते"-
    इस शेर पर तो मन वाह, वाह कर उठा !
    बेहतरीन रचना । आभार ।

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  10. jitni taareef karoon wo kam hai.....
    aapke jaise kaheen andaaz nahi milte....
    khatm ho chukhe hai lafzon ke dafeene....
    aapki rachna mein chaar chaand lagaane ko alfaaz nahi milte...

    bahut he aafareen gazal hai ji...

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  11. सुन्दर कविता मैंने कुछ ऐसे कहा है " कौन रहता है मुस्तकिल अपने असूलों पर
    लोग हर लम्हा यहां रंग बद्लते है
    किस पर हो यकीं किस पर गुमां करू
    लोग हर् रोज नई शक्ल मे ढलते है
    किससे करू वफ़ा वेवफ़ा किसे कहूं
    यहां नफरत को लोग बडे ढंग से समझते है
    मिज़ाज अपना ही बदल लेता हूँ कृष्ण
    दीवानगी की लोग यहा कद्र कहा करते है

    कृष्ण कुमार मिश्र
    लखीमपुर खीरी

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  12. ये ज़ुल्मो-सितम कैसे मिट पाएँगे दुनिया से
    बुजदिल हैं सभी चेहरे जांबाज़ नहीं मिलते
    वाह जी वाह क्या कमाल की ग़ज़ल कही,

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  13. Archna Ji,
    HOLI KI SHUBH KAAMNAYEIN
    BAHUT KHOOB LIKHA HAI ...
    ये ज़ुल्मो-सितम कैसे मिट पाएँगे दुनिया से
    बुजदिल हैं सभी चेहरे जांबाज़ नहीं मिलते
    SURINDER RATTI

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  14. कोई भी किसी से अब कुछ भी नहीं कहता है
    इंसानों की बस्ती में हमराज़ नहीं मिलते

    जख्मी है बदन अपना ये रूह भी जख्मी है
    हाल अपना बताने को अल्फाज़ नहीं मिलते
    bahut hi laazwaab ,har haal behtar byan huye ,
    happy holi

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  15. मिलते हैं यहाँ दुश्मन, हमसाज़ नहीं मिलते
    जो दोस्त हैं उनके भी अंदाज़ नहीं मिलते...


    इन पंक्तियों ने दिल को छू लिया.... बहुत ही मनभावन रचना....

    रेगार्ड्स..

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  16. aapki rachnaa ko baar-baar
    padhne ko dil karta hai
    aur khaas taur pr ye sher...
    कोई भी किसी से अब कुछ भी नहीं कहता है
    इंसानों की बस्ती में हमराज़ नहीं मिलते

    waah-waa !!
    lajwaab ....

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  17. कोई भी किसी से अब कुछ भी नहीं कहता है
    इंसानों की बस्ती में हमराज़ नहीं मिलते
    बहुत सुन्दर गज़ल है अर्चना जी.

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  18. मिलते हैं यहाँ दुश्मन, हमसाज़ नहीं मिलते
    जो दोस्त हैं उनके भी अंदाज़ नहीं मिलते
    Wah!

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  19. उलझन से, मुसीबत से, अब हुस्न के जलवों में
    नखरे नहीं मिलते हैं, वो नाज़ नहीं मिलते

    ye naaz waali baat bahut achchi kahi...aas paas ke artificial hote ehsaason ko khub tatola hai shabdon se....

    कोई भी किसी से अब कुछ भी नहीं कहता है
    इंसानों की बस्ती में हमराज़ नहीं मिलते

    khokhale hote rishton aur khoti hui maasoomiyat ko darshata ye sher achcha laga....sunkar laga ki kaash ham itne diplomatic aur political na hote apne personal relations mein to duniya jyada sundar hoti.....

    keep writing
    best regards,
    'Waahid'

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  20. आदरणीय महोदया ,
    सादर प्रणाम,

    पिछले कई दशक से हमारे समाज में महिलाओं को पुरुषों के बराबर का दर्जा देने के सम्बन्ध में एक निर्थक सी बहस चल रही है. जिसे कभी महिला वर्ष मना कर तो कभी विभिन्न संगठनो द्वारा नारी मुक्ति मंच बनाकर पुनर्जीवित करने का प्रयास किया जाता रहा है. समय समय पर बिभिन्न राजनैतिक, सामाजिक और यहाँ तक की धार्मिक संगठन भी अपने विवादास्पद बयानों के द्वारा खुद को लाइम लाएट में बनाए रखने के लोभ से कुछ को नहीं बचा पाते. पर इस आन्दोलन के खोखलेपन से कोई भी अनभिज्ञ नहीं है शायद तभी यह हर साल किसी न किसी विवादास्पद बयान के बाद कुछ दिन के लिए ये मुद्दा गरमा जाता है. और फिर एक आध हफ्ते सुर्खिओं से रह कर अपनी शीत निद्रा ने चला जाता है. हद तो तब हुई जब स्वतंत्र भारत की सब से कमज़ोर सरकार ने बहुत ही पिलपिले ढंग से सदां में महिला विधेयक पेश करने की तथा कथित मर्दानगी दिखाई. नतीजा फिर वही १५ दिन तक तो भूनते हुए मक्का के दानो की तरह सभी राजनैतिक दल खूब उछले पर अब १५ दिन से इस वारे ने कोई भी वयान बाजी सामने नहीं आयी.

    क्या यह अपने आप में यह सन्नाटा इस मुद्दे के खोख्लेपर का परिचायक नहीं है?

    मैंने भी इस संभंध में काफी विचार किया पर एक दुसरे की टांग खींचते पक्ष और विपक्ष ने मुझे अपने ध्यान को एक स्थान पर केन्द्रित नहीं करने दिया. अतः मैंने अपने समाज में इस मुद्दे को ले कर एक छोटा सा सर्वेक्षण किया जिस में विभिन्न आर्थिक, समाजिक, राजनैतिक, शैक्षिक और धार्मिक वर्ग के लोगो को शामिल करने का पुरी इमानदारी से प्रयास किया जिस में बहुत की चोकाने वाले तथ्य सामने आये. २-४०० लोगों से बातचीत पर आधारित यह तथ्य सम्पूर्ण समाज का पतिनिधित्व नहीं करसकते फिर भी सोचने के लिए एक नई दिशा तो दे ही सकते हैं. यही सोच कर में अपने संकलित तथ्य आप की अदालत में रखने की अनुमती चाहता हूँ. और आशा करता हूँ की आप सम्बंधित विषय पर अपनी बहुमूल्य राय दे कर मुझे और समाज को सोचने के लिए नई दिशा देने में अपना योगदान देंगे.

    http://dixitajayk.blogspot.com/search?updated-min=2010-01-01T00%3A00%3A00-08%3A00&updated-max=2011-01-01T00%3A00%3A00-08%3A00&max-results=6
    Regards

    Dikshit Ajay K

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  21. aaj ek nai lekhikaa se parichay hua. achchha lagaa. badhai. aapki anek ghazale dekh li. lucknow kee sheroshaairee bhare mahaul kaa asar dikh rahaa hai. aane vale samay me ek achchhi shayara milsakti hai sahitya ko.

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  22. आपके ब्लॉग की हर रचना उम्मीदों से भरी हुई है... बहुत बधाईयां.. लिखती रहें...मेरे ब्लॉग पर भी एक नजर दें...

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  23. ये ज़ुल्मो-सितम कैसे मिट पाएँगे दुनिया से
    बुजदिल हैं सभी चेहरे जांबाज़ नहीं मिलते

    अर्चना जी इस बेहतरीन ग़ज़ल के लिए मेरी दिली दाद कबूल करें...
    नीरज

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