शुक्रवार, 16 सितंबर 2016

जिंदगी हर सुबह की

ज़िन्दगी शुरू होती है हर सुबह
कुछ इस तरह
रोज़मर्रा के काम जल्दी-जल्दी निपटाना
तैयार हो काम के लिए निकलना
ठीक स्कूटर निकालते वक़्त
एक स्कूल की वैन का घर के सामने रुकना
ड्राइवर का मुझे निकलते हुए देखना
बच्चों का खिड़की से झाँकना
फिर एक अंजाना सा रिश्ता बन जाना
और प्रतिदिन की आदत में शुमार हो जाना
ज़िन्दगी शुरू होती है हर सुबह
कुछ इस तरह।


घर से निकलते ही
कुछ दूरी पर छड़ी लिए एक बुज़ुर्ग का मिलना
चौराहे पर बस के इंतज़ार में खड़े
रोज़ाना उन्हीं चेहरों का दिखना
बगल से सर्राटा स्कूल बसों का निकलना
फिर एक अंजाना सा रिश्ता बन जाना
और प्रतिदिन की आदत में शुमार हो जाना
ज़िन्दगी शुरू होती है हर सुबह
कुछ इस तरह।


वही शहीद पथ, वही फ़्लाईओवर
वही बाईं ओर उगते सूरज का दिखना
वही रेलिंग, वही पंछियों के जोड़ों का बैठना
फिर एक अंजाना सा रिश्ता बन जाना
और प्रतिदिन की आदत में शुमार हो जाना
ज़िन्दगी शुरू होती है हर सुबह
कुछ इस तरह।


कोने वाली वही अंडे-दूध-ब्रेड की गुमटी
साईकिल पर जाते वही स्कूली बच्चे
झोपड़ी के बाहर सड़क के किनारे बैठे
कटोरे में चाय पीते फैन खाते बच्चे
पास ही कुत्तों के झुण्ड को
कूदते फाँदते देखना फिर अचानक
उनका स्कूटर के आगे आ जाना
फिर एक अंजाना सा रिश्ता बन जाना
और प्रतिदिन की आदत में शुमार हो जाना
ज़िन्दगी शुरू होती है हर सुबह
कुछ इस तरह।


वही उबड़-खाबड़ खड़न्जों का रास्ता
पानी के गड्ढों को पार कर
स्कूल पहुंचना
गुडमॉर्निंग की आवाज़ों का स्वागत करना
भागते हुए अंदर जाना
निगाह दीवार घड़ी की सात दस की सुइयों से टकराना
रजिस्टर पर पड़े वही बिना ढक्कन के पेन का होना
साइन करना और एक साँस में सीढियाँ चढ़ जाना
और स्टाफरूम में जाकर बैठ जाना
एक घूँट पानी गले से उतारना
और साँसों में स्फूर्ति का भर जाना
फिर एक अंजाना सा रिश्ता बन जाना
और प्रतिदिन की आदत में शुमार हो जाना
ज़िन्दगी शुरू होती है हर सुबह
कुछ इस तरह।


सोचती हूँ इन्हें शब्दों के डिब्बों में बंद कर लूँ
ताकि जब कभी जीवन अकेला सा लगे
हाथों से छूटता सा लगे
तो खोल कर बाहर निकाल लूँ इन खुशनुमा पलों को
फिर से अपने अंदर स्फूर्ति भरने के लिए
जीवन के बचे हुए सफ़र को तय करने के लिए
ताकि ये रहें हमेशा मेरे साथ, मेरे बाद।




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