गुरुवार, 18 जून 2009

दिल गमगीन क्यूँ है?...



जवां तमन्नाओं की रौ में
दिल परेशान क्यूँ है
वक़्त है उमंगों का फिर भी
काया में थकान क्यों है ?

जज्बातों को ना समझ सके जो
उन चाहतों के ख़ूनी फरमान क्यों है ?
भरी महफ़िल में हो के भी
अपनों में अकेला इंसान क्यों है ?

जिंदादिली की ना पूछो दोस्तों
इस कदर तबियत परेशान क्यों है ?
रग-रग में लहू बहता है फिर भी
खूने दिल बर्फ़ान क्यों है ?

इस चलते-फिरते पुतलों के शहर में
पत्थर का बुत बना भगवान क्यों है ?
दुनिया के हसीन मेलों में भी
मौत का सामान क्यों है ?

आशाओं के इस छलकते समंदर में
निराशाओं का तूफ़ान क्यों है ?
साहिल के करीब होने पर भी
कश्तियों के डूबने का चलन क्यों है ?

साथियों की अठखेलियों के बीच
बचपन यूँ संजीदा क्यों है ?
उम्र है चहकने की फिर भी
कंधों पर बोझों का एहसान क्यों है ?

वो खूने जिगर हो के भी
दिल को दर्द के देता निशान क्यों है ?
अपनी ही सहेज़ी शाखें हैं फिर भी
गुल-ए-ख़ास चुनता बागवान क्यों है ?

जिंदगी जवान है फिर भी
मौत का हुस्न लगता हसीन क्यों है ?
जिंदगी खुदा की इनायत है फ़िर भी
वो मौत पे मेहरबान क्यों है ?





(चित्र गूगल सर्च से साभार)

11 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुन्दर भावाभियक्ति ...............जिन्दगी तो वेवफा है .........

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  2. आपके सारे सवाल जायज हैं। और सवालों से सराबोर रचना काबिले तरीफ है।
    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }

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  3. हर एक शब्द बहुत खास और बहुत मायने रखता है! बहुत सुंदर कविता नही, यह तो ज़िंदगी की दास्तान है !

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  4. jane kis cheez ki kami hai abhi ke dil gamgeen hai.....sunder ahsas hai apke..

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  5. सुन्दर रचना-भावपूर्ण.

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  6. धन्यवाद् ,अर्चना जी आपने मेरे ब्लॉग पर दस्तक दी .आपका का मेरे ब्लॉग पर हमेशा स्वागत है . आपकी रचनाओं मे भावः पूर्ण प्रश्न भी बहुत सटीक होते है.

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  7. apke blog par phli bar hi ana hua hai .
    bhut hi ghre ahsas liye rchna hai kbhi kbhi jindgi ke khalipan ya yu khe aspas ke bhavna shuny vyvhar asi bhavnaye janm leti hai.

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  8. मै पहली बार आई हूँ आपके ब्लॉग पे.. ..!
    हरेक पंक्ति अलग से दाद माँगती है ...और क्या कहूँ ?

    "दूरसे आसमाँ कितना मनोहारी लगता है ,
    फिर भी , सर पे छत हो , क्यों लगता है ?

    धूप के बिना जीवन नही ,पैर चाहे जलते हैं ,
    चाँदनी मन जलाती है ,वही प्यारी क्यों लगे है?"

    आपकी रचनाएँ पढ़, ये पंक्तियाँ लिखीं..!

    http://lalitlekh.blogspot.com

    http://kavitasbyshama.blogspot.com

    http://aajtakyahantak-thelightbyalonelypath.blogspot.com

    http://shama-baagwaanee.blogspot.com

    अन्य ब्लॉग लिंक्स इन्हीं ब्लोग्स पे मिल जायेंगे...
    शायद आपको, गृहसज्जा, फाइबर आर्ट, चिंदी-चिंदी...ये blogs भी अच्छे लगें!
    स्नेहिल निमंत्रण और इंतज़ार है!
    शमा

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  9. अर्चना जी,

    आपके परिचय से जो जीवन ध्येय मिलता है निस्वार्थ सेवा और शिक्षा दान अनुकरणीय है, सराहनीय है।

    साथियों की अठखेलियों के बीच
    बचपन यूँ संजीदा क्यूँ है?

    बहुत ही खूबसूरत पंक्तियाँ है, बचपन के छिने जाने पर मैं भी चिंतित हूँ और सिर्फ चिंता ही कर पाया हूँ, आपसे सीखा जाना शेष है।

    सादर,

    मुकेश कुमार तिवारी

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