रविवार, 28 जून 2009

सावन की वो घड़ियाँ....


लगी जब-जब सावन की फुहारों की लड़ियाँ
याद आने लगी हमारे मिलन की वो घड़ियाँ

सोचा नहीं था मिलेंगे हम इक दिन
देखा जब मैंने तुम्हारी आंखों में उस दिन

वो भीगा सा आँचल वो भीगी फिजाएं
वो सड़कों पे ढूंढ़ना दरख्तों के साए

वो चंचल शोख हवाओं का बहना
वो हाथों को पकड़े हुए राहों पे चलना

वो नजदीक आना अपनी ओट में छुपाना
वो दुनिया की नज़रों से मुझको बचाना

याद रहेगा हमेशा वो मिलना हमारा
दुआ है रब से आए ऐसा सावन
दोबारा


चित्र गूगल सर्च साभार

11 टिप्‍पणियां:

  1. ऐसा सावन दुबारा आये और हर ऐसा सावन हमेशा बचा रहे.

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  2. bahut hi sunder archna ji bhavo ki itni sunder abhivyakti vo bhi yaado se bhut khub meri badhayi swikaar kare
    saadar
    praveen pathik
    9971969084

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  3. sawan ki ghadiya aisee hi hoti hai ...............najuk palo ko bahut hi sundrata se aapane sajaya hai ...........thanks alot

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  4. aapka blog pahli bar dekha padha aap bahut accha likhti hain...badhai.

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  5. sawan ka maza to ab aa raha hai aapki es rachna ko padhne ke baad

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  6. भावपूर्ण रचना -- स्मृतियो को ताज़ा कर गयी. चित्र भी बहुत खूब

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  7. सावन की फुहाड़ का इंतजार सभी को होता है । फिर चाहे मनुष्य हो या पशु । धरती की भी आस रहती है कि सावन आये और उसकी बढ़ती प्यास को बुझाये । सावन के बिना तो मौसम अधूरा है । अच्छा लिखा है आपने धन्यवाद

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  8. आपकी लेखनी में एक मिठास सी है।
    और हाँ, आपके फोटो का चयन लाजवाब होता है। इन दोनों की जितनी तारीफ की जाए कम है।
    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }

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  9. आपकी कविताओं में ताज़गी है..रवानी है...कुछ है जो आकर्षित करता है...शुभकामनाएँ..

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