मंगलवार, 31 मई 2016

शब्द चुभते हैं

चुभते हैं।
कुछ शब्द
चुभते हैं।


रिश्तों के बीच हो जाती हैं
जब छुटपुट झड़पें
अनजाने ही बन जाते हैं
कुछ शब्द
किरकिरे नुकीले बाण
जो चल जाते हैं
अपनों पर
और फिर
जीवन पर्यंत
चुभते रहते हैं।


कुछ शब्द 

चुभते रहते हैं।


शब्द रच देते हैं
एक अभेद चक्रव्यूह
जिसमें फँसता जाता है
जितना भी निकलना चाहता है
जो न जीता है न मरता
अकेला निहत्था
रिश्ता।

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 02-06-2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2361 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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  2. "जो न जीता है न मरता
    अकेला निहत्था
    रिश्ता"
    भावनाशील प्रस्तुति.

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