शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017

प्रेम...

 मधुमास यानी प्रेम का मास...
प्रेम शब्दों में सिमटी कोई कविता नहीं है
जिसे प्रकट करने के लिए कहा जाय
प्रेम प्रकट किये जाने का मोहताज भी नहीं है
क्योंकि यह अप्रकट होकर भी संचारित हो जाता...
प्रेम शर्तों में लिपटी कोई नियमावली भी नहीं है
जिसको मानने के लिए  बाध्य किया जाय
क्योंकि प्रेम बाँधे जाने पर नहीं जुड़ता
यह जुड़ता है अबाध विश्वास से ....


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