रविवार, 5 जुलाई 2009

शब्-ए-खामोश


शब्--तनहा महफ़िल में
छाई जैसे कोई ग़मी सी है

सबा के आँचल में जब्ज
आज थोड़ी नमी सी है


कुमुदनी के रुखसारों पे
इक बूँद शबनमी सी है

बादलों के आगोश में गुम
आज चांदनी धुंधली सी है


रुत की खामोशियों में
इक ग़ज़ल की कमी सी है



(चित्र गूगल सर्च से साभार)

11 टिप्‍पणियां:

  1. ek gazal ki kami si hai ............kya baat hai ........bahut bahut sundar

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  2. khoob soorat ग़ज़ल है.............. रात की tanhaai में.............. सच much किसी भी tanhai में ग़ज़ल adhoori ही होती है

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  3. behtreen gazal

    मैंने अपने ब्लॉग पर एक लेख लिखा है . - फ़ेल होने पर ख़त्म नहीं हो जाती जिंदगी - समय हो तो पढें और कमेन्ट भी दें .

    http://www.ashokvichar.blogspot.com

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  4. अर्चना जी,
    वाह क्या गजल कही आपने दिल खुश हो गया
    आप ने जो लिखा उसका भाव मुझे बहुत अच्छा लगा

    आपका स्वागत है तरही मुशायरे में भाग लेने के लिए सुबीर जी के ब्लॉग सुबीर संवाद सेवा पर
    जहाँ गजल की क्लास चलती है आप वहां जाइए आपको अच्छा लगेगा

    इसे पाने के लिए आप इस पते पर क्लिक कर सकते हैं।

    venuskesari@gmail.com
    वीनस केसरी

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  5. रचना बहुत अच्छी लगी....बहुत बहुत बधाई....

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  6. अर्चना जी इस सुन्दर रचना के लिये बधाई सवीकार करें शुभकामनायें

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  7. archana ji

    bahut sundar gzal .. bhavnaaye ubhar kar aa gayi hai ..aakhri sher gazab ka hai ji

    Aabhar

    Vijay

    Pls read my new poem : man ki khidki
    http://poemsofvijay.blogspot.com/2009/07/window-of-my-heart.html

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