बुधवार, 26 मई 2010

किसी भी शाख पे अब घोंसला नहीं है क्यों ?


जवां दिलों में कहीं हौसला नहीं है क्यों

मेरे वतन में कोई रहनुमा नहीं है क्यों


चमन को सींच रहा है लहू से जो माली

उसे चमन में कहीं आसरा नहीं है क्यों


हजारों बोझ तले क्यों सिसकता है बचपन

वो खुल के हंसता, कभी खेलता नहीं है क्यों


हमेशा उसने भरे हैं अमीर के खलिहान

मगर गरीब को दाना मिला नहीं है क्यों


कभी चमन की फिज़ा घोंसलों से थी गुलज़ार

किसी भी शाख पे अब घोंसला नहीं है क्यों


कई करोड़ हैं मन्दिर, जगह जगह पूजन

किसी के दिल में मगर आस्था नहीं है क्यों


(चित्र गूगल सर्च से साभार)

39 टिप्‍पणियां:

  1. अर्चना जी बहुत बढ़िया लिखा है आपने

    पढ़ कर मज़ा आ गया

    ये शेर तो खास पसंद आया

    हजारों बोझ तले क्यों सिसकता है बचपन
    वो खुल के हंसता, कभी खेलता नहीं है क्यों

    एक शेर के रदीफ मे दिक्कत हो रही है काफिया पलट गया है और रदीफ की जगह पहुच गया है

    (मुझे लग रहा है टाईपिंग करते समय भूल हुई है कृपया सुधार करें )


    मगर गरीब को दाना नहीं मिला है क्यों
    को

    मगर गरीब को दाना मिला नहीं है क्यों
    करें

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  2. कभी चमन की फिजा घोंसलों से थी गुलज़ार
    किसी भी शाख पे अब घोंसला नहीं है, क्यों
    ग़ज़ल के सभी शेर लाजवाब हैं....ये खास तौर पर पसंद आया.

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  3. मुझे भी बहुत पसंद आयी ग़ज़ल लेकिन ज्यादा समझ नहीं शायद वीनस भाई का सुझाव भी ध्यान देने योग्य है..

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  4. चमन को सींच रहा है लहू से जो माली
    उसे चमन में कहीं आसरा नहीं है क्यों
    माली को किसने आसरा दिया है भला
    बहुत बढिया

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  5. हजारों बोझ तले क्यों सिसकता है बचपन
    वो खुल के हंसता, कभी खेलता नहीं है क्यों


    -सभी शेर एक से बढ़कर एक!! बधाई!

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  6. चमन को सींच रहा है लहू से जो माली
    उसे चमन में कहीं आसरा नहीं है क्यों
    कई करोड़ हैं मन्दिर, जगह जगह पूजन
    किसी के दिल में मगर आस्था नहीं है क्यों

    लाजवाब ! बहुत सुन्दर पंक्तियाँ और बेहतरीन अभिव्यक्ति ...

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  7. अर्चना जी, आपने ये मुद्दे की बात कही है.

    जवां दिलों में कहीं हौसला नहीं है क्यों
    मेरे वतन में कोई रहनुमा नहीं है क्यों

    ...आज युवाओं में उच्च राजनैतिक सोच का अभाव है. जबकि वे ही कर्णधार हैं.

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  8. सबसे पहले निवेदन है कि वीनस केसरी जी ने जो सुझाव दिया है, कृपया उसका पालन करें, टाइप में ऐसी गलतियाँ हो जाती हैं.
    गजल आपने बेहद शानदार लिखी , बहुत सी प्रशंसाएं देख भी रहा हूँ. कुछ लोग जल मरे भी होंगे, शायद मैं भी.

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  9. सर जी आप भी अच्छा मज़ाक कर लेते हो...आप भला मुझ जैसी नवसिखिये से क्यूँ जलेंगे

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  10. वीनस जी सुझाव देने का शुक्रिया

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  11. हजारों बोझ तले क्यों सिसकता है बचपन
    वो खुल के हंसता, कभी खेलता नहीं है क्यों

    ये भी और आखरी वाला शेर भी कमाल क है ... बहुत कुछ पूछता है इस व्यवस्था से ...

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  12. कई करोड़ हैं मन्दिर, जगह जगह पूजन

    किसी के दिल में मगर आस्था नहीं है क्यों,

    अर्चना जी मुझे याद नही शायद पहले आपकी रचनाओं को पढ़ा हूँ की नही पर आज की प्रस्तुति बहुत बढ़िया लगी..आज की यह समाज आपके इस क्यों प्रश्न का उत्तर देने में असमर्थ है क्योंकि प्रश्न भी समाज ने ही खड़ा किया है...एक सुंदर और भावपूर्ण रचना..धन्यवाद अर्चना जी

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  13. बहुत उम्दा ग़ज़ल....एक एक शेर बहुत कुछ कह गया....

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  14. बेहतरीन अभिव्यक्ति ......

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  15. Hello,

    This is one of your best compositions.

    Keep up your great work!

    Cheers!
    Surender.

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  16. बहुत खूब----पेश है...

    रोटी से जुडी थी आस्था जब तक ।
    आस्था से जुडी थी रोटी जब तक ।
    आस्थाहीन रोटी पर जबतक रहेगी नज़र ’
    दाने दाने को रहेंगे हम बेहाल तब तक॥

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  17. अर्चना जी ! लाजबाव लिखा है ।

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  18. कई करोड़ हैं मन्दिर, जगह जगह पूजन
    किसी के दिल में मगर आस्था नहीं है क्यों

    ये खास तौर पर पसंद आया.

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  19. बहुत अच्छी गजल है आपकी है।

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  20. कित्ता अच्छा लिखा आपने ..ढेर सारी बधाई व प्यार !!
    _____________
    और हाँ, 'पाखी की दुनिया' में साइंस सिटी की सैर करने जरुर आइयेगा !

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  21. देर हुई आने में , इन दिनों व्यस्तता अधिक रहती है ..
    हर शेर एक एक त्रासदी को बयान कर रहा है ..
    पहला - दिशाहीन , आशाहीन युवा पीढ़ी की त्रासदी .
    दूसरा - देश की ..
    तीसरा - बचपन की ..
    चौथा - गरीबी की ..
    पांचवां - दूसरे शेर की ही त्रासदी को दिखाता , दूसरी तरह से ..
    छठा - अनास्था की ..
    ----------
    इस प्रकार एक मुकम्मल होती गजल ! आभार !

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  22. जिंदगी की तल्ख सच्चाईयों को गजल में इतनी खूबसूरती से कम लोग ही बयां कर पाते हैं।
    --------
    क्या आप जवान रहना चाहते हैं?
    ढ़ाक कहो टेसू कहो या फिर कहो पलाश...

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  23. यह बहुत अच्छी सोच और प्रयास है. "कभी चमन की फिज़ा घोंसलों से थी गुलज़ार....किसी भी शाख पे अब घोंसला नहीं है क्यों "...पंतियाँ बहुत छू लेने वाली हैं.....

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  24. प्रिय अर्चना जी,
    अच्छी रचना के लिए बधाई
    " चमन को सींच .......आसरा नहीं हैं क्यों " पंक्ति इस रचना का सार लगी , बहुत संवेदनशील रचनाये लिखती हैं आप , वैसे लड़किओं में ये जन्मजात गुण होता ही हैं ,

    -
    !! श्री हरि : !!
    बापूजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे

    Email:virender.zte@gmail.com
    Blog:saralkumar.blogspot.com

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  25. कई करोड़ हैं मन्दिर, जगह जगह पूजन

    किसी के दिल में मगर आस्था नहीं है क्यों

    बहुत ही बेहतरीन ग़ज़ल...हर शेर लाजवाब है...बधाई
    नीरज

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  26. archana ji

    sirf waah waah hi kahunga .. saari gazale padhi aapki , lekin mujhe kuch jyaada hi acchi lagi .. dil se badhayi kabool kare..
    कई करोड़ हैं मन्दिर, जगह जगह पूजन
    किसी के दिल में मगर आस्था नहीं है क्यों

    ye ulti mate hai ji

    archana ji ,itna sanvedansheel likhti ho aap , ek acchi si kavita bhi likhe

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  27. चमन को सींच रहा है लहू से जो माली

    उसे चमन में कहीं आसरा नहीं है क्यों

    बहुत अच्छी गजल है आपकी है। nice creation, congrates..

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