मंगलवार, 20 जुलाई 2010

दोस्तों की आस्तीनों में छुपे हैं नाग अब


दोस्तों की आस्तीनों में छुपे हैं नाग अब
रहनुमा, रहज़न बने हैं, इनसे बच कर भाग अब

गांव, बस्ती, शहर, क़स्बा, देश का हर भाग अब
जल चुका है, क्या बुझेगी नफरतों की आग अब

भूख, बेकारी, गरीबी और बे तालीम लोग
कब तलक ये दुःख सहें हम, क्यों न जाएँ जाग अब

जो पड़ोसी गा रहा है, आप भी वो गाइए
तीर जैसा चुभ रहा है शांति वाला राग अब

आरियाँ ही चल रही है सब्ज़ बागों पर यहाँ
सारे पंछी जा चुके हैं बस बचे हैं काग अब

गालियाँ, बेहूदे जुमले, बदतमीजी और नाच
कौन फागुन में यहाँ पर गा रहा है फाग अब


शांत साहिल देख कर किस को पता चल पाएगा
ज्वार सागर पर चढ़ा था, कह रहे हैं झाग अब


(चित्र गूगल सर्च से साभार)


31 टिप्‍पणियां:

  1. वाह-वाह, आपकी गजल पढकर दिल से यह आवाज़ खुद ब खुद फूट पड़ी. आप बहुत मेहनत कर रही हैं और गजलों को जिस तरह नए, जीवंत, सम-सामयिक प्रसंगों से जोड़ रही हैं, उनकी जितनी सराहना की जाए, कम है. लेखनी की इस रफ्तार को और गति दीजिए. आप युवा हैं और साहित्य के साथ मुझ जैसों को भी आपसे ढेरों अपेक्षाएं हैं. इतने मुश्किल काफिए और इतनी कठिन रदीफ़ का निर्वहन जिस आसानी से आपने किया है, उसे देखकर तो मैं भी घबरा गया. बधाई.

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  2. रहनुमा, रहज़न बने हैं.................nice

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  3. बहुत अच्छा लिखा है आपने। इन अशआरों में वर्तमान हालातों में आपकी सोच बेहतरीन लगी।

    आरियाँ ही चल रही है सब्ज़ बागों पर यहाँ
    सारे पंछी जा चुके हैं बस बचे हैं काग अब

    गालियाँ, बेहूदे जुमले, बदतमीजी और नाच
    कौन फागुन में यहाँ पर गा रहा है फाग अब

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  4. शांत साहिल देख कर किस को पता चल पाएगा
    ज्वार सागर पर चढ़ा था, कह रहे हैं झाग अब.... वाह..वाह

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  5. आस्तीनों में छिपे हैं नाग अब...
    वर्तमान परिदृश्य का सटीक आकलन कर रही है आपकी कविता ..!

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  6. भूख, बेकारी, गरीबी और बे तालीम लोग
    कब तलक ये दुःख सहें हम, क्यों न जाएँ जाग अब

    जागना ही होगा अब और एकजुट होकर इस देश के खजाने को इसी देश के भ्रष्ट नेताओं और मंत्रियों द्वारा लूटने से बचाना होगा ...

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  7. दोस्तों की आस्तीनों में छुपे हैं नाग....sach hai, sambhal ke chalna hai, aankhen khuli rakhke

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  8. सर्वत सर जी बहुत-बहुत धन्यवाद मेरे ब्लॉग पर आने के लिए आपका यहाँ सदैव स्वागत है . मैंने क्या लिखा है ये तो पता नहीं लेकिन जब आपका कमेन्ट पढ़ा तो लगा की कुछ ख़ास तो जरूर है...आपके कमेन्ट ने मेरी इस ग़ज़ल के ख़ास होने की मोहर लगा दी...मैं आपको धन्यवाद देने आपके ब्लॉग पे गई मुझे अपनी ग़ज़ल तो भूल गई जब वहाँ आपकी ताज़ा तरीन ग़ज़ल पढ़ने को मिली..आपने इतने दिनों के बाद कुछ लिखा..लेकिन एक दुःख भी हुआ कि आपने अपना कमेन्ट बॉक्स बंद कर दिया..ऐसा लगा जैसे कि आपके द्वार हमसभी के लिए बंद हो गए हैं...हम लोगों से क्या खता हुई जो आपने अपने दिल के द्वार बंद कर दिए...आपने लिखा है ...

    "कुछ काम की व्यस्तता, कुछ हालात, इन सभी ने कुछ ऐसा किया कि लगा जैसे नेट से मोह भंग हो गया हो. चाहते हुए भी कुछ नहीं हो सका. कुछ मित्रों से राय ली-क्या ब्लॉग बंद कर दूं....जवाब मिला, ऐसा होता रहता है. लगे रहो. फिर भी मन को चैन नहीं था. फिर सोचा यह कमेन्ट वगैरह का चक्कर खत्म कर दिया जाए. यह पॉइंट कुछ जचा, कमेन्ट का ऑप्शन खत्म कर दिया. जिन्हें मुझे पढना है, पढ़ लें. प्रशंसा लेकर करूंगा भी क्या......."

    ...इससे लग रहा है कि आपके साथ अवश्य कुछ घटित हुआ है...मैं कमेन्ट लिखना चाह रही थी इसलिए मैं अपने ब्लॉग पे ही कमेन्ट देन रही हूँ ...कभी तो आप पढेंगे ही..

    आपकी ग़ज़ल मुझे बेहद पसंद आई सभी अशआर चुन-चुन के बने हैं बड़ी खूबसूरती से लेकिन मुझे ये अधिक पसंद आए ...

    कभी खादी, कभी खाकी के चर्चे
    हमारे दौर में तैमूर क्या है

    गुलामी बन गयी है जिनकी आदत
    उन्हें चित्तौड़ क्या, मैसूर क्या है

    यही दिल्ली, जिसे दिल कह रहे हो
    अगर नजदीक है तो दूर क्या है

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  9. बहुत सुन्दर ग़ज़ल...

    'पाखी की दुनिया' में आपका स्वागत है.

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  10. AAj ke haalat ka shaandaar chitran.........bahut hi umda..RACHNA. Dhanaybaad.

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  11. ग़ज़ल रुपी यह पोस्ट बहुत अच्छी लगी...

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  12. गालियाँ, बेहूदे जुमले, बदतमीजी और नाच
    कौन फागुन में यहाँ पर गा रहा है फाग अब

    वाह...वा...क्या खूब कहा है...बेहतरीन ग़ज़ल...दाद कबूल करें...
    नीरज

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  13. आरियाँ ही चल रही है सब्ज़ बागों पर यहाँ
    सारे पंछी जा चुके हैं बस बचे हैं काग अब



    शानदार ग़ज़ल...

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  14. अर्चना जी . समसामयिकता का बखूबी बयान करती गजल ।
    प्रशंसनीय ।

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  15. बहुत अच्छा लिखा है आपने।
    यह पोस्ट बहुत अच्छी लगी...

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  16. शांत साहिल देख कर किस को पता चल पाएगा
    ज्वार सागर पर चढ़ा था, कह रहे हैं झाग अब
    बेहद खूबसूरत भाव की रचना

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  17. वाह आपको भी पता चल गया कि दोस्त आस्तिनों में रहने लगे हैं। हमें तो इसका अंदाज होने में टाइम लगा पर लग ही गया। फागुन तो सब गाते हैं अब भी। ये अलग है कि फागुन के बोल में गालियां हा गालियां रह गई हैं वो भी कीचड़ वाली।

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  18. मंगलवार 27 जुलाई को आपकी रचना ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है .कृपया वहाँ आ कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ .... आभार

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  19. शांत साहिल देख कर किस को पता चल पाएगा
    ज्वार सागर पर चढ़ा था, कह रहे हैं झाग अब ..

    लाजवाब ग़ज़ल ... सब शेर बहुत ही अच्छे बन पड़े है .... आज के हालात को उतारा है आपने इन शेरों में ...

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  20. शांत साहिल देख कर किस को पता चल पाएगा
    ज्वार सागर पर चढ़ा था, कह रहे हैं झाग अब .bahut khub lagi aapki yah gajal shukriya

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  21. carchamanch me apki gazaal padne ka mauka mila. bahoot hi sachchai ke sath aapne bat kahi hai...........veri nice

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  22. अर्चना जी
    नमस्कार !
    बहुत अच्छा लिख रही हैं आप , बधाई !

    गांव, बस्ती, शहर, क़स्बा, देश का हर भाग अब
    जल चुका है, क्या बुझेगी नफरतों की आग अब



    बहुत ख़ूब !

    शस्वरं पर आपका हमेशा हार्दिक स्वागत है , आइएगा , और आते रहिएगा …


    - राजेन्द्र स्वर्णकार
    शस्वरं

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  23. archan ji
    bahut hi acchi aur sacchi gazal ..

    bahut se sher , bahut hi acche ban padhe hai ..

    badhayi

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  24. bahut khoob kaha hai behtareen bas aap ek cheez pe dhyaan dein k aapne jo blog title mein jazbaton world use kiya hai dar asal jazbaat khud hi mein ek plural world hai jazbe ka so please write jazbaat instead of jazbaton.

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  25. एकदम सही तस्वीर बने है कलां से आपने

    समाज और व्यक्ति का सही चरित्र-चित्रण....

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