बुधवार, 22 जुलाई 2009

राहें



कहती हैं लम्बी सूनसान राहें
हर पल राहों पे आते-जाते
दिखाती हूँ भटकते मुसाफिरों को
मंजिल का रास्ता
करके खुद की गुमराह राहें
कहती हैं लम्बी सूनसान राहें

साथ देती हूँ राही का हर मोड़ पे
पर वो भूल जातें हैं
खुद की मंजिलों को पा के
कहती हैं लम्बी सूनसान राहें

शिकवा नहीं है किसी से
ना कोई गिला है
पर क्या कोई चलेगा
ता उम्र साथ उसके
कहती हैं लम्बी सूनसान राहें



(चित्र गूगल सर्च से साभार )

10 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छी लगीं आपकी ये बतियाती राहें...
    बधाई..

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  2. raah aur raahgeer ek doosre ke bina adhure hain :)
    koi chalega aur jaroor chalega..bas uchit samay ka intezaar karen :)

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  3. सुनसान राहो से बात हुई. यादो मे आने लगी फिर.
    सुन्दर रचना

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  4. raaste sunsaan bhale he ho lekin....aap jaise raahgeer mil jaayein toh safar aasan ho jaata hai....

    very nicely written...
    keep rolling!

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  5. आपका चित्र सलेक्शन गज़ब का रहता है !

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  6. बहुत ख़ूब, सुन्दर अभिव्यक्ति

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  7. raah hi to hai jindagi me..baki kuch nahi..
    aaj kal ki bhag daud wali jindagi me manjeel bhi ab raah jaisa lagata hai..
    ek rasta fir dusara ..fir dusara..
    badhiya bhav..badhiya kavita..
    badhayi

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